Monday, May 13, 2013

वेद माता

बज रहा है शंख प्रतिध्वनि से भरा ससार| 
दिश-विदिश में गूंजता है एक वह ओंकार || 
एक वह झंकार अविरल हो रही सब ओर | 
छु रही जिसकी तरंगे सूर्य-शशि का छोर|| 
बज रहा है एक ही वह ,कौन जाने,तार| 
और सातों स्वर सुरीले कर रहे गुंजार|| 
राग-रागिनियाँ विविध ये, रंग-रूप अपार| 
सब उसी का गीत गाते,कर रहे श्रृंगार || 

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