बज रहा है शंख प्रतिध्वनि से भरा ससार|
दिश-विदिश में गूंजता है एक वह ओंकार ||
एक वह झंकार अविरल हो रही सब ओर |
छु रही जिसकी तरंगे सूर्य-शशि का छोर||
बज रहा है एक ही वह ,कौन जाने,तार|
और सातों स्वर सुरीले कर रहे गुंजार||
राग-रागिनियाँ विविध ये, रंग-रूप अपार|
सब उसी का गीत गाते,कर रहे श्रृंगार ||
दिश-विदिश में गूंजता है एक वह ओंकार ||
एक वह झंकार अविरल हो रही सब ओर |
छु रही जिसकी तरंगे सूर्य-शशि का छोर||
बज रहा है एक ही वह ,कौन जाने,तार|
और सातों स्वर सुरीले कर रहे गुंजार||
राग-रागिनियाँ विविध ये, रंग-रूप अपार|
सब उसी का गीत गाते,कर रहे श्रृंगार ||
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