ॐ
वेदशास्त्रपुराणानि समान्यगणिका इव |
एकैव शांभवी मुद्रा गुप्ता कुलवधूरिव ||
अंतर्लक्ष्यं बहीदृष्टिर्निर्मेषोन्मेवर्जिता |
एषा सा शांभवी मुद्रा वेदशास्त्रषु गोपिता ||
शांभवी मुद्रा का वर्णन आरम्भ करते हुए प्रथम उसका महत्व प्रकट किया है यह मुद्रा कुलवधू के समान गोपनीय है |
अन्तर्लक्षविलीनचित्तपवनो योगी यदा वर्तते |
दृष्टया निश्चलतातारया बहिरध: पश्यन्नपश्यन्नपि||
मुद्रेयं खलु शांभवी भवति सा लब्धा प्रसादाद्गुरो : |
शून्याशून्यविलक्षणं स्फुरति तत्तत्वं परं शाम्भवं ||
जब योगी अपने चित्त और वायु को अन्तर्लक्ष्य में लय करके निश्चल तारे दृष्टि से शरीर के बाहर देखता हुआ भी नहीं देखता ,यह शाम्भवी मुद्रा गुरु के प्रसाद से प्राप्त होती है ||
श्रीशांभव्याश्च खेचर्यां अवस्थाधामभेदतः |
भावेच्चित्तलयानन्द: शून्ये चित्सुखरूपिणी ||
शाम्भवी और खेचरी मुद्राओं के द्वारा अवस्था और धाम के भेद से शून्य चित्त सुख स्वरूप चित्त के लय का आनन्द होता है ||
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