Wednesday, December 7, 2011

राजयोग ३

                                                               ॐ तत्सत् ॐ 
ज्ञात्वा सुषुम्नासदभेदं  कृत्वा  वायुं च मध्यगम् |स्थित्वा सदैव  सुस्थाने ब्रह्मरन्ध्रे  निरोधयेत् ||
   
           श्रेष्ठ  स्थान  में  रहकर  और  सुषुम्ना  नाडी  के भेदन  की  विधि  जानकर   साधक  प्राणवायु  का  सुषुम्ना  में  संचार  करें  |
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सुर्याचन्द्रमसौ  धत्तः  कालं रात्रिदिवात्मकम् | भोक्त्री  सुषुम्ना  कालस्य  गुह्यामेतदुदाह्यतम् ||

            सूर्य  , चन्द्रमा ,  रात्रि दिवसात्मक काल के धारण करने वाले हैं और  उस काल को भोगने वाली सुषुम्ना है , यह गुह्य रहस्य प्रकट किया है ||
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द्वासप्ततिसहस्त्रणि  नाडीद्वाराणि पंजरे | सुषुम्ना शांभवी  शक्ति:  शेषास्त्वेव  निरर्थकाः  ||

             मनुष्य  शरीर में बहत्तर  हजार नाड़ियों  के  द्वार  हैं ,उनमे सुषुम्ना  नाडी  शाम्भवी  शक्ति  हैं  और  शेष  सब  नाडियाँ   निरर्थक  है ||
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 वायु: परिचितो यस्मादग्निना सः  कुंडलीम् | बोधयित्वा  सुषुम्नायाँ  प्रवेशेदनिरोधतः ||
सुषुम्नावाहिनि  प्राणे सिध्द्यत्येव मनोन्मनी | अन्यथा  त्वितराभ्यासा: प्रयासायैव योगिनाम् ||

            परिचित हुआ  वायु  जठराग्नि के साथ कुंडली  को बोधित करके  अवरोध  रूप सुषुम्ना  में  प्रविष्ट  होता  है |जब प्राणवायु  सुषुम्ना  में  प्रवाहित  होता है , तब  मनोन्मनी अवस्था  सिद्ध  हो जाती  है |योगियों  के इससे  अन्य अभ्यास  के  जितने  भी  प्रयास  है, वे सब  व्यर्थ  होते है || 
                                                   
पवनो बध्यते येन मनस्तेनैव बध्यते |मनश्च बध्यते  येन  पवनस्तेन बध्यते ||
हेतुद्वयम्  तु  चित्तस्य  वासना  च समीरणः| तयोर्विनष्ट: एकस्मिस्तौ द्वापि विनश्यत: ||
मनो  यत्र विलीयेत पवनस्तत्र  लीयते  |  पवनो  लीयते  यत्र  मनस्तत्र विलीयते  ||

           जिस अभ्यास  से योगी  वायु  का बंधन करता है, उसी  से मन का बंधन कर लेता है  इस प्रकार मन  का बंधन होता है ,उसी से वायु का बंधन हो जाता है |चित्त  की प्रवृत्ति में दो हेतु होते है वासना और वायु | इनमें से एक का नाश  होने पर दूसरे का भी  नाश  हो जाता है |  जहाँ मन   विलीन  होता है वहीं  वायु विलीन होता है और  जहाँ वायु  लीन होता है ,वहाँ  मन  भी लीन  हो जाता है  |    
                                                         
दुग्धांबुवत्संमिलितावुभौ तौ तुल्यक्रियौ मानसमारुतौ हि |यतोमरुत्तत्र मनःप्रवृत्तिर्यतो मनस्तत्र  मरुत्प्रवृत्ति:|
तत्रैकनाशादपरस्य नाश  एक्स्यवृत्तेर परप्रवृत्ति: | अध्वस्तयोचेन्द्रियवर्गवृत्ति प्रध्वास्तयोर्मोक्षपदस्यसिद्धि :|
रसस्य मनसश्चैव चंचलत्वं स्वभावतः| रसो  बद्धो  मनो बध्दं किं न  सिध्द्यति भूतले ||

           जैसे ढूध और जल मिलकर एक हो जाते हैं  उनके रूप और क्रिया में कोई अंतर  नहीं  रहता ,वैसे ही  मन और प्राणवायु  के संयोग  को समान  समझना चाहिए | एक की प्रवृत्ति से दूसरे की प्रवृत्ति होती है |जब तक सब  इन्द्रियों  का  अपने-अपने  विषय  में प्रवृत्त होना  नहीं रुकता, तब तक मोक्षपद  की  सिद्धि  भी  संभव  नहीं  है |

मूर्च्छितो हराते व्याघ्रीन्मृतो जिवयति स्वयम्  | बद्धः खेचरतां धत्ते रसो वायुश्च पार्वति ||

              मूर्छित रस और प्राण रोगों का हरण करते है और मरा हुआ रस एवं ब्रह्मरंध्र में लीन प्राण मनुष्य को जीवन देता है और खेचरत्व प्राप्त कराता है |


मंस्थर्ये स्थिरो वायुस्ततो बिंदुः स्थिरो भवेत | बिन्दुस्थर्यात्सद सत्वं पिण्डस्थर्यै प्रजायते ||
इन्द्रियाणां मनोनायो मनोंअथ्स्तु मारुतः | मारुतस्य लायो नाथः स लायो नादमश्रितः ||
सोऽयमेवास्तु मोक्षाख्यो मास्तु वापु मतान्तरे | मनः प्राणलये कश्चिदानन्ददः सम्प्रवर्तते ||

               मन के स्थिर होने पर प्राण भी स्थिर हो जाता है और प्राण की स्थिरता से बिंदु स्थिर होता है | बिंदु की स्थिरता से सदा सत्व रहता है और उसको शरीर में स्थिरता उत्पन्न होती है | इन्द्रियों का स्वामी मन , है मन का स्वामी प्राण है, प्राण का स्वामी लय है और लय नाद से आश्रित है , यही मोक्ष कहलाता है | मतान्तर से मन और प्राण का लय होने पर अनिर्वचनीय आनंद प्रकट होता है  |


प्रनष्टश्वासनिश्वासः प्रध्वस्तविषयग्रहः | निश्चेष्टो निर्विकारस्य लयो जयति योगिनाम |
उच्छिन्नसर्वसंकल्पों निःशेषाशेषचेष्टितः | स्वावगम्यो लयः कोऽपी जायते वाग गोचरः ||
 यत्र द्रिष्टिर्लयस्तव भूतेंद्रियसनातनी | सा शक्तिर्जीवभूतानां द्वे अलक्ष्ये लयं गते ||
लयो लय इति प्राहुःकिदृशः लय लक्षणम् | अपुनर्वासनोत्थानाल्लयो विषयविस्मृतिः ||


      श्वाश निःश्वास रहित, विषय के ग्रहण से उन्मुख चेष्टा-रहित और विकार -रहित योगियों का लय होता है | सर्व संकल्पों की उच्छिन्नता ,अशेष चेष्टाओं से निवृत्ति, वाणी से न कहा जाने योग्य लय योगियों का होता है |
जहाँद्रिष्टि का लय होता है , वहाँ सनातनभूत और इन्द्रिय नहीं रहते | जीवों की शक्ति रूप विद्या , अविद्या दोनों का ही अलक्ष्य में लय हो होता है | विषय की विस्मृति और वासनाओं का पुनः न उठना हि लय लय है || 
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