Wednesday, August 21, 2013

श्रावणी महापर्व "रक्षा-बंधन "

:: वैदिक रक्षा सूत्र बनाने की विधि ::

प्रतिवर्ष श्रावणी-पूर्णिमा को रक्षाबंधन का त्यौहार होता है, पुरोहित अपने यजमान को तथा जिस किसी की भी रक्षा की कामना की जाती है उसे रक्षा सूत्र बंधा जाता है । यह रक्षा सूत्र यदि वैदिक रीति से बनाई जाए तो शास्त्रों में उसका बड़ा महत्व है ।

इसके लिए ५वस्तुओं की आवश्यकता होती है –

(१) दूर्वा (घास) (२)अक्षत (चावल) (३) केसर (४) चन्दन (५) सरसों के दाने ।

इन ५ वस्तुओं को रेशम के कपड़े में लेकर उसे बांधदें या सिलाई कर दें, फिर उसे कलावा में पिरो दें, इस प्रकारवैदिक राखी तैयार हो जाएगी ।

इन पांच वस्तुओंका महत्त्व –

(१) दूर्वा - जिस प्रकार दूर्वा का एक अंकुर बो देने पर तेज़ी से फैलता है और हज़ारों की संख्या में उग जाता है, उसीप्रकार मेरे भाई का वंश और उसमे सदगुणों का विकास तेज़ी से हो । सदाचार, मन की पवित्रता तीव्रता से बढ़ती जाए । दूर्वा गणेश जी को प्रिय है अर्थात हम जिसे राखी बाँध रहे हैं , उनके जीवन में विघ्नों का नाश हो जाए ।

(२) अक्षत - हमारी गुरुदेव के प्रति श्रद्धा कभी क्षत-विक्षत ना हो सदा अक्षत रहे ।

(३) केसर - केसर की प्रकृति तेज़ होती है अर्थात हम जिसे राखी बाँध रहे हैं, वह तेजस्वी हो । उनके जीवन में आध्यात्मिकता का तेज, भक्ति का तेज कभी कम ना हो ।

(४) चन्दन - चन्दन की प्रकृति शीतल होती है और यह सुगंध देता है । उसी प्रकार उनके जीवन में शीतलता बनी रहे, कभी मानसिक तनाव ना हो । साथ ही उनके जीवन में परोपकार, सदाचार और संयम की सुगंध फैलती रहे ।

(५) सरसों के दाने- सरसों की प्रकृति तीक्ष्ण होती है अर्थात इससे यह संकेत मिलता है कि समाज के दुर्गुणों को, कंटकों को समाप्त करने में हम तीक्ष्ण बनें।

इस प्रकार इन पांच वस्तुओं से बनी हुई एक राखी को सर्वप्रथम अपने इष्ट देवी देवता / भगवान श्री गुरु दत्तात्रेय / अपने गुरु के श्री-चित्र पर अर्पित करें । फिर बहनें - भाई, माता - पिता , दादा - दादी अपने भाई , बहन , बच्चों ,पोते को शुभ संकल्प करके बांधे ।

महाभारत में यह रक्षा सूत्र माता कुंती ने अपने पोते अभिमन्यु को बाँधी थी । जब तक यह धागा अभिमन्यु के हाथ में था तब तक उसकी रक्षा हुई, धागा टूटने पर अभिमन्यु की मृत्यु हुई ।

देवासुर संग्राम में युद्ध में जाते समय इन्द्राणी सची ने देवराज इन्द्र को रक्षा-सूत्र बांध कर विदा किया था और देवराज इन्द्र विजयी हुए थे |


इस प्रकार इन पांचवस्तुओं से बनी हुई वैदिक राखी को शास्त्रोक्त नियमानुसार बांधते हैं | हम पुत्र-पौत्र एवं बंधुजनों सहित वर्ष भर सूखी रहते हैं । रक्षा-सूत्र परम कल्याणकारी रक्षाकारक है , अवश्य बंधना चाहिए |

रक्षा सूत्र बांधते समय ये श्लोक बोलें –

येन बद्धो बलिःराजा दानवेन्द्रो महाबलः । तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चलः ॥

yena baddho baliḥrājā dānavendro mahābalaḥ | tena tvāmanubadhnāmi rakṣe mā cala mā calaḥ ||

Monday, May 13, 2013


धर्मनिरपेक्षता, सर्वधर्मसमभाव का नारा देने वाले, कथाओ के बीच भरी भीड़ में औरतों को नचाने वाले धर्मध्वजी? नाचना-गाना-मटकना तो सिखा सकते है पर कभी जनता को धर्म के वास्तविक स्वरूप से परिचित नहीं करा सकते...

भगवान के तथाकथित प्रेमप्रसंगो को चट

कारे लगा लगाकर सुनाने वाले, एवं सिर्फ श्रवण-वर्णन ,गायन,नृत्य मात्र से ही ईश्वर की प्राप्ति कराने का दावा करने वाले पहले स्वयं भगवान को प्राप्त क्यो नहीं करके दिखाते ? क्यो कि हमारे ही ग्रंथ चीख चीखकर कहते है की कर्मविहीन, कर्तव्यविहीन भक्ति कभी भगवान की प्राप्ति नहीं करा सकती ...अर्जुन भी अगर धर्मयुद्ध छोडकर, सिर्फ पूजा-पाठ में ही लग जाते जैसा की अर्जुन ने स्वयं कहा भी था तो क्या श्री कृष्ण के परमप्रिय बन पाते? श्री कृष्ण ने मना किया था न....पर ये नहीं बताते इस बात को ....क्यो नहीं बताते? भैया दुकान कैसे चलेगी फिर???

में सिर्फ एक बात पुछना चाहती हू - श्रीमद भागवत कथा को 7 दिन सुनने के पश्चात ही जब परीक्षित जी का कल्याण हो गया था,और सात दिन में ही परमगति को,परमशांति को परमानंद को मनुष्य प्राप्त कर लेता है , भागवत मे भी कहा गया है तो आजकल तो प्रतिदिन ही हजारो स्थानो पर प्रतिदिन ही कथाये हो रही है न ... कितनों का कल्याण हो रहा है ? इसे छोड़िए जो कथाये कर रहे है उन्ही का कल्याण हो रहा है क्या?(पैसो को छोडकर).... अरे यहा कथावाचकों की उम्र निकल जाती है, पूरे जीवन में सौ से ज्यादा कथाए कर डालते है तो जब स्वयं उनका ही कल्याण नहीं हो रहा तो??

और क्यो नहीं हो रहा इसके अनेक कारण है जैसे कि कथाओ में चालीस प्रतिशत बाते तो ऐसी बोली जाती है जो भागवत में होती तक नहीं है, सिर्फ इधर उधर से लाकर कहानिया जोड़ दी जाती है...दूसरा एक ओर तो कहते है कि हे ...हे... हे....!!! हमे मुक्ति नही चाहिए हमे तो भक्ति मे ही आनंद मिलता है - अरे अगर ऐसा ही है मुक्ति चाहिए ही नहीं तो एक कथा मे दस दस बार क्यो कहते हो कि भागवत सुन लो मुक्ति ले लो , क्यो बोली लगाते हो मुक्ति की? और इसी वाक्य का सार निकाल दिया कि सुनने मात्र से ही मुक्ति मिल जाएगी भक्तजनों, सारी इच्छाए पूरी हो जाएगी, भगवान प्रसन्न हो जाएँगे...बाकी कुछ करने की जरूरत ही नहीं है , भगवान श्री कृष्ण को इनके बराबर ज्ञान नहीं था जो गीता बोली जीवन भर कर्म और धर्म का पालन करके हमे शिक्षा देकर गए , ये नहीं सिखाते .. तो कैसे होगा कल्याण ?

आज प्रतिदिन हजारो की संख्या मे गोमाताए काट काटकर, भूनकर, पेक करके फैला दी जाती है जीभ का स्वाद पूरा करने के लिए.... गोमाता के बछड़ो तक को जीवित, खौलते पानी मे उबालकर उनकी खाल जूते-चप्पल बनाने के लिए खीची जाती है.....अनेक स्थानो पर हिन्दू लड़कियो को प्रेम जाल मे फसाकर अथवा बलात्कार आदि करके उन्हे मुस्लिम बनने पर मजबूर किया जाता है, आए दिन सनातन वैदिक धर्म के विरुद्ध फतवे निकाल दिये जाते है ... हिन्दुओ के ही देश में,भारत भूमि पर ही , हिन्दुओ के ही भगवान श्री राम का , उन्ही की जन्मभूमि पर एक मंदिर तक नहीं बन पा रहा, रामनवमी तक पर रोक के लिए किसी इस्लामी कीड़े द्वारा घोषणा कर दी जाती है, सफ़ेद टोपी छुट-पुट दाढ़ी रखने वालो द्वारा जो भीषण आघात व प्रहार सनातन धर्म पर किया जा रहा है वो प्रत्यक्ष है... ... इसे नहीं तो और किसे धर्म की दुर्गति कहा जाएगा? और हिन्दुओ के बहुसंख्यक होने की स्थिति में भी ऐसा होने के अनेक कारण है किन्तु उनमे से एक मुख्य कारण है है - कि ऐसी घोर विषम परिस्थितियो में भी देश के अधिकांश कथित भक्त राधे राधे राधे राधे करते हुये सामूहिक नृत्य कर रहे है...


राधे राधे राधे राधे राधे....... ये राधे राधे बोलने वाली कौम कभी किसी मोर्चे पर फतह हासिल नहीं कर सकती..... जिन्हे ये सिखा दिया गया हो कि राधे राधे बोलने मात्र से ही कल्याण हो जाएगा .... तो वो क्यो धर्मोत्थान एवं धर्म की रक्षा के लिए संघर्ष करना चाहेंगे? सीधी सी बात है कृष्ण जी भी मुरली बजाते थे न पर जब धर्म पर बात आई तो मूरली को एकतरफ रखके सुदर्शन हाथ मे लिया था न ....

ये नाचने मटकने वाली जनता... किस तरह इन कुधर्मियों से मुक़ाबला कर पाएगी?

अर्जुन ने दुर्योधन आदि कौरवो को तथा अन्य दुष्टो को राधे राधे बोलते हुये मारा था क्या.... वीर शिवाजी महाराज ने राधे राधे करते हुये मुगलो को काटकर इस राष्ट्र और हिन्दुओ की रक्षा की थी क्या.... गुरु गोविंद सिंह जी सहित अनेकों गुरुओ ने राधे राधे बोलते हुये अपने सर कटवाए थे क्या.....असंख्यों क्रांतिकारियों मे से किसी एक ने भी राधे राधे बोलते हुये अंग्रेज़ो से लोहा लिया था क्या?गुजरात के वीर हिन्दुओ ने राधे राधे बोलते हुये मुस्लिम म्लेक्षों को आग में भूना था क्या? क्या कोई ऐसा धर्मयोद्धा अथवा राष्ट्रभक्त अथवा महानभक्त ही सही, आज तक के इतिहास में इस धरती पर हुआ है जिसने राधे राधे बोलते हुये ,धर्मरक्षा अथवा राष्ट्ररक्षा मे योगदान भी दिया हो ????


सर्वथा आप्तकाम,योगेश्वर , धर्म-संस्थापक , दुष्ट-संघारक ,परमज्ञेय श्री कृष्ण भगवान जिन्होने जीवन भर कर्म से कर्म मे ही बरता, परमचरित्रवान जिन्होने पूरे जीवन काल मे कोई अधर्म नहीं किया,कोई अनैतिक कार्य नहीं किया, जिनका चरित्र दोपहर के सूर्य से भी अधिक स्वच्छ, प्रखर और निर्मल है उन अखिलेश्वर भगवान श्री कृष्ण को तुमने मात्र नाचने-गाने-बजाने वाले बना के रख दिया...मात्र रास रचाने वाले, कपड़े चुराने वाले, सामाजिक मर्यादा के विरुद्ध कर्म करने वाला बना डाला....श्री कृष्ण का नाम लेकर दुकान चलाने वालो क्या तुमने श्री कृष्ण के साथ विश्वासघात नहीं किया? प्रत्येक धर्मद्रोही विवाद होने पर श्री कृष्ण के उन्ही प्रसंगो को लाकर मुंह पर मारता है जो तुम्हारे द्वारा भक्ति के नाम पर हस कर खुश होकर मस्ती से झूमते हुये सुनाये जाते है...श्री कृष्ण जैसी दिव्य विभूति के चरित्र को कलंकित करने मे सबसे बड़ा योगदान तुम्हारा ही है....तो मे क्यो न इसे कृष्ण द्रोह और विश्वासघात का नाम दू? इस तरह के जितने भी प्रसंग है जो श्री कृष्ण की छवि को कलंकित करते है , ये सब मिथ्या काल्पनिक और गप्प मात्र है...अपने अपने स्वार्थो के लिए जोड़ दिये गए है .. श्री कृष्ण ने ऐसा कोई काम किया ही नहीं है कि कोई उनके ऊपर एक उंगली तक उठा सके...और ये बात में हवा मे नहीं कह रहा....अगर इनमे से किसी धर्मध्वजी मे दम है तो आए सामने, मे पूर्णतः प्रमाणो, तर्को एवं तथ्यो के आधार पर अपनी बात सिद्ध करके दिखा सकता हू.... पर ये , इन बातौ को नहीं बताएँगे क्यो कि अगर ये सच बोल बैठे तो फिर इनका तो बिजनेस ही ठंडा पड जाएगा न ...वैसे भी इन्हे भक्त नहीं अपने पांडालो मे भीड़ ही चाहिए...


मेरी किसी बात से अगर किसी को ठेस पहुचती है तो मे इसका जिम्मेदार बिलकुल नहीं हू...तुम्हारी भावनाए इतनी आहत नहीं हो सकती जितनी मेरी होती है तुम्हारे द्वारा |

Photo: धर्मनिरपेक्षता, सर्वधर्मसमभाव का नारा देने वाले, कथाओ के बीच भरी भीड़ में औरतों को नचाने वाले धर्मध्वजी? नाचना-गाना-मटकना तो सिखा सकते है पर कभी जनता को धर्म के वास्तविक स्वरूप से परिचित नहीं करा सकते...

भगवान के तथाकथित प्रेमप्रसंगो को चटकारे लगा लगाकर सुनाने वाले, एवं सिर्फ श्रवण-वर्णन ,गायन,नृत्य मात्र से ही ईश्वर की प्राप्ति कराने का दावा करने वाले पहले स्वयं भगवान को प्राप्त क्यो नहीं करके दिखाते ? क्यो कि हमारे ही ग्रंथ चीख चीखकर कहते है की कर्मविहीन, कर्तव्यविहीन भक्ति कभी भगवान की प्राप्ति नहीं करा सकती ...अर्जुन भी अगर धर्मयुद्ध छोडकर, सिर्फ पूजा-पाठ में ही लग जाते जैसा की अर्जुन ने स्वयं कहा भी था तो क्या श्री कृष्ण के परमप्रिय बन पाते? श्री कृष्ण ने मना किया था न....पर ये नहीं बताते इस बात को ....क्यो नहीं बताते? भैया दुकान कैसे चलेगी फिर???

में सिर्फ एक बात पुछना चाहती हू - श्रीमद भागवत कथा को 7 दिन सुनने के पश्चात ही जब परीक्षित जी का कल्याण हो गया था,और सात दिन में ही परमगति को,परमशांति को परमानंद को मनुष्य प्राप्त कर लेता है , भागवत मे भी कहा गया है तो आजकल तो प्रतिदिन ही हजारो स्थानो पर प्रतिदिन ही कथाये हो रही है न ... कितनों का कल्याण हो रहा है ? इसे छोड़िए जो कथाये कर रहे है उन्ही का कल्याण हो रहा है क्या?(पैसो को छोडकर).... अरे यहा कथावाचकों की उम्र निकल जाती है, पूरे जीवन में सौ से ज्यादा कथाए कर डालते है तो जब स्वयं उनका ही कल्याण नहीं हो रहा तो??
 और क्यो नहीं हो रहा इसके अनेक कारण है जैसे कि कथाओ में चालीस प्रतिशत बाते तो ऐसी बोली जाती है जो भागवत में होती तक नहीं है, सिर्फ इधर उधर से लाकर कहानिया जोड़ दी जाती है...दूसरा एक ओर तो कहते है कि हे ...हे... हे....!!! हमे मुक्ति नही चाहिए हमे तो भक्ति मे ही आनंद मिलता है - अरे अगर ऐसा ही है मुक्ति चाहिए ही नहीं तो एक कथा मे दस दस बार क्यो कहते हो कि भागवत सुन लो मुक्ति ले लो , क्यो बोली लगाते हो मुक्ति की? और इसी वाक्य का सार निकाल दिया कि सुनने मात्र से ही मुक्ति मिल जाएगी भक्तजनों, सारी इच्छाए पूरी हो जाएगी, भगवान प्रसन्न हो जाएँगे...बाकी कुछ करने की जरूरत ही नहीं है , भगवान श्री कृष्ण को इनके बराबर ज्ञान नहीं था जो गीता बोली जीवन भर कर्म और धर्म का पालन करके हमे शिक्षा देकर गए , ये नहीं सिखाते .. तो कैसे होगा कल्याण ?

आज प्रतिदिन हजारो की संख्या मे गोमाताए काट काटकर, भूनकर, पेक करके फैला दी जाती है जीभ का स्वाद पूरा करने के लिए.... गोमाता के बछड़ो तक को जीवित, खौलते पानी मे उबालकर उनकी खाल जूते-चप्पल बनाने के लिए खीची जाती है.....अनेक स्थानो पर हिन्दू लड़कियो को प्रेम जाल मे फसाकर अथवा बलात्कार आदि करके उन्हे मुस्लिम बनने पर मजबूर किया जाता है, आए दिन सनातन वैदिक धर्म के विरुद्ध फतवे निकाल दिये जाते है ... हिन्दुओ के ही देश में,भारत भूमि पर ही , हिन्दुओ के ही भगवान श्री राम का , उन्ही की जन्मभूमि पर एक मंदिर तक नहीं बन पा रहा, रामनवमी तक पर रोक के लिए किसी इस्लामी कीड़े द्वारा घोषणा कर दी जाती है, सफ़ेद टोपी छुट-पुट दाढ़ी रखने वालो द्वारा जो भीषण आघात व प्रहार सनातन धर्म पर किया जा रहा है वो प्रत्यक्ष है... ... इसे नहीं तो और किसे धर्म की दुर्गति कहा जाएगा? और हिन्दुओ के बहुसंख्यक होने की स्थिति में भी ऐसा होने के अनेक कारण है किन्तु उनमे से एक मुख्य कारण है है - कि ऐसी घोर विषम परिस्थितियो में भी देश के अधिकांश कथित भक्त राधे राधे राधे राधे करते हुये सामूहिक नृत्य कर रहे है...

राधे राधे राधे राधे राधे....... ये राधे राधे बोलने वाली कौम कभी किसी मोर्चे पर फतह हासिल नहीं कर सकती..... जिन्हे ये सिखा दिया गया हो कि राधे राधे बोलने मात्र से ही कल्याण हो जाएगा .... तो वो क्यो धर्मोत्थान एवं धर्म की रक्षा के लिए संघर्ष करना चाहेंगे? सीधी सी बात है कृष्ण जी भी मुरली बजाते थे न पर जब धर्म पर बात आई तो मूरली को एकतरफ रखके सुदर्शन हाथ मे लिया था न ....
ये नाचने मटकने वाली जनता... किस तरह इन कुधर्मियों से मुक़ाबला कर पाएगी?

अर्जुन ने दुर्योधन आदि कौरवो को तथा अन्य दुष्टो को राधे राधे बोलते हुये मारा था क्या.... वीर शिवाजी महाराज ने राधे राधे करते हुये मुगलो को काटकर इस राष्ट्र और हिन्दुओ की रक्षा की थी क्या.... गुरु गोविंद सिंह जी सहित अनेकों गुरुओ ने राधे राधे बोलते हुये अपने सर कटवाए थे क्या.....असंख्यों क्रांतिकारियों मे से किसी एक ने भी राधे राधे बोलते हुये अंग्रेज़ो से लोहा लिया था क्या?गुजरात के वीर हिन्दुओ ने राधे राधे बोलते हुये मुस्लिम म्लेक्षों को आग में भूना था क्या? क्या कोई ऐसा धर्मयोद्धा अथवा राष्ट्रभक्त अथवा महानभक्त ही सही, आज तक के इतिहास में इस धरती पर हुआ है जिसने राधे राधे बोलते हुये ,धर्मरक्षा अथवा राष्ट्ररक्षा मे योगदान भी दिया हो ????

सर्वथा आप्तकाम,योगेश्वर , धर्म-संस्थापक , दुष्ट-संघारक ,परमज्ञेय श्री कृष्ण भगवान जिन्होने जीवन भर कर्म से कर्म मे ही बरता, परमचरित्रवान जिन्होने पूरे जीवन काल मे कोई अधर्म नहीं किया,कोई अनैतिक कार्य नहीं किया, जिनका चरित्र दोपहर के सूर्य से भी अधिक स्वच्छ, प्रखर और निर्मल है उन अखिलेश्वर भगवान श्री कृष्ण को तुमने मात्र नाचने-गाने-बजाने वाले बना के रख दिया...मात्र रास रचाने वाले, कपड़े चुराने वाले, सामाजिक मर्यादा के विरुद्ध कर्म करने वाला बना डाला....श्री कृष्ण का नाम लेकर दुकान चलाने वालो क्या तुमने श्री कृष्ण के साथ विश्वासघात नहीं किया? प्रत्येक धर्मद्रोही विवाद होने पर श्री कृष्ण के उन्ही प्रसंगो को लाकर मुंह पर मारता है जो तुम्हारे द्वारा भक्ति के नाम पर हस कर खुश होकर मस्ती से झूमते हुये सुनाये जाते है...श्री कृष्ण जैसी दिव्य विभूति के चरित्र को कलंकित करने मे सबसे बड़ा योगदान तुम्हारा ही है....तो मे क्यो न इसे कृष्ण द्रोह और विश्वासघात का नाम दू? इस तरह के जितने भी प्रसंग है जो श्री कृष्ण की छवि को कलंकित करते है , ये सब मिथ्या काल्पनिक और गप्प मात्र है...अपने अपने स्वार्थो के लिए जोड़ दिये गए है .. श्री कृष्ण ने ऐसा कोई काम किया ही नहीं है कि कोई उनके ऊपर एक उंगली तक उठा सके...और ये बात में हवा मे नहीं कह रहा....अगर इनमे से किसी धर्मध्वजी मे दम है तो आए सामने, मे पूर्णतः प्रमाणो, तर्को एवं तथ्यो के आधार पर अपनी बात सिद्ध करके दिखा सकता हू.... पर ये , इन बातौ को नहीं बताएँगे क्यो कि अगर ये सच बोल बैठे तो फिर इनका तो बिजनेस ही ठंडा पड जाएगा न ...वैसे भी इन्हे भक्त नहीं अपने पांडालो मे भीड़ ही चाहिए...

मेरी किसी बात से अगर किसी को ठेस पहुचती है तो मे इसका जिम्मेदार बिलकुल नहीं हू...तुम्हारी भावनाए इतनी आहत नहीं हो सकती जितनी मेरी होती है तुम्हारे द्वारा |

श्री कृष्ण को बदनाम किया जाता देखकर...जिसमे विरोध ज्यादा हो किन्तु भीतर मे हित छिपा हो, ऐसा सच बोलने के लिए कलेजा चाहिए होता है...धर्म, ईश्वर और सत्य के मामले मे कोई समझौता नहीं, कोई कंप्रोमाईज़ नहीं...धर्मज्ञ बनो, श्रेष्ठकर्मवान बनो, निर्भीक बनो, सत्यवादी बनो, ईश्वर के सच्चे प्रेमी और भक्त बनो, तब होगा कल्याण.........जय श्री कृष्ण....... जय श्री राम

श्री कृष्ण को बदनाम किया जाता देखकर...जिसमे विरोध ज्यादा हो किन्तु भीतर मे हित छिपा हो, ऐसा सच बोलने के लिए कलेजा चाहिए होता है...धर्म, ईश्वर और सत्य के मामले मे कोई समझौता नहीं, कोई कंप्रोमाईज़ नहीं...धर्मज्ञ बनो, श्रेष्ठकर्मवान बनो, निर्भीक बनो, सत्यवादी बनो, ईश्वर के सच्चे प्रेमी और भक्त बनो, तब होगा कल्याण.........जय श्री कृष्ण....... जय श्री राम

वेद माता

बज रहा है शंख प्रतिध्वनि से भरा ससार| 
दिश-विदिश में गूंजता है एक वह ओंकार || 
एक वह झंकार अविरल हो रही सब ओर | 
छु रही जिसकी तरंगे सूर्य-शशि का छोर|| 
बज रहा है एक ही वह ,कौन जाने,तार| 
और सातों स्वर सुरीले कर रहे गुंजार|| 
राग-रागिनियाँ विविध ये, रंग-रूप अपार| 
सब उसी का गीत गाते,कर रहे श्रृंगार || 

Sunday, November 18, 2012

धर्म का मर्म


धर्मनिरपेक्षता, सर्वधर्मसमभाव का नारा देने वाले, कथाओ के बीच भरी भीड़ में औरतों को नचाने वाले धर्मध्वजी? नाचना-गाना-मटकना तो सिखा सकते है पर कभी जनता को धर्म के वास्तविक स्वरूप से परिचित नहीं करा सकते...

भगवान के तथाकथित प्रेमप्रसंगो को चट

कारे लगा लगाकर सुनाने वाले, एवं सिर्फ श्रवण-वर्णन ,गायन,नृत्य मात्र से ही ईश्वर की प्राप्ति कराने का दावा करने वाले पहले स्वयं भगवान को प्राप्त क्यो नहीं करके दिखाते ? क्यो कि हमारे ही ग्रंथ चीख चीखकर कहते है की कर्मविहीन, कर्तव्यविहीन भक्ति कभी भगवान की प्राप्ति नहीं करा सकती ...अर्जुन भी अगर धर्मयुद्ध छोडकर, सिर्फ पूजा-पाठ में ही लग जाते जैसा की अर्जुन ने स्वयं कहा भी था तो क्या श्री कृष्ण के परमप्रिय बन पाते? श्री कृष्ण ने मना किया था न....पर ये नहीं बताते इस बात को ....क्यो नहीं बताते? भैया दुकान कैसे चलेगी फिर???

में सिर्फ एक बात पुछना चाहता हूँ - श्रीमद भागवत कथा को 7 दिन सुनने के पश्चात ही जब परीक्षित जी का कल्याण हो गया था,और सात दिन में ही परमगति को,परमशांति को परमानंद को मनुष्य प्राप्त कर लेता है , भागवत मे भी कहा गया है तो आजकल तो प्रतिदिन ही हजारो स्थानो पर प्रतिदिन ही कथाये हो रही है न ... कितनों का कल्याण हो रहा है ? इसे छोड़िए जो कथाये कर रहे है उन्ही का कल्याण हो रहा है क्या?(पैसो को छोडकर).... अरे यहा कथावाचकों की उम्र निकल जाती है, पूरे जीवन में सौ से ज्यादा कथाए कर डालते है तो जब स्वयं उनका ही कल्याण नहीं हो रहा तो??
और क्यो नहीं हो रहा इसके अनेक कारण है जैसे कि कथाओ में चालीस प्रतिशत बाते तो ऐसी बोली जाती है जो भागवत में होती तक नहीं है, सिर्फ इधर उधर से लाकर कहानिया जोड़ दी जाती है...दूसरा एक ओर तो कहते है कि हे ...हे... हे....!!! हमे मुक्ति नही चाहिए हमे तो भक्ति मे ही आनंद मिलता है - अरे अगर ऐसा ही है मुक्ति चाहिए ही नहीं तो एक कथा मे दस दस बार क्यो कहते हो कि भागवत सुन लो मुक्ति ले लो , क्यो बोली लगाते हो मुक्ति की? और इसी वाक्य का सार निकाल दिया कि सुनने मात्र से ही मुक्ति मिल जाएगी भक्तजनों, सारी इच्छाए पूरी हो जाएगी, भगवान प्रसन्न हो जाएँगे...बाकी कुछ करने की जरूरत ही नहीं है , भगवान श्री कृष्ण को इनके बराबर ज्ञान नहीं था जो गीता बोली जीवन भर कर्म और धर्म का पालन करके हमे शिक्षा देकर गए , ये नहीं सिखाते .. तो कैसे होगा कल्याण ?

आज प्रतिदिन हजारो की संख्या मे गोमाताए काट काटकर, भूनकर, पेक करके फैला दी जाती है जीभ का स्वाद पूरा करने के लिए.... गोमाता के बछड़ो तक को जीवित, खौलते पानी मे उबालकर उनकी खाल जूते-चप्पल बनाने के लिए खीची जाती है.....अनेक स्थानो पर हिन्दू लड़कियो को प्रेम जाल मे फसाकर अथवा बलात्कार आदि करके उन्हे मुस्लिम बनने पर मजबूर किया जाता है, आए दिन सनातन वैदिक धर्म के विरुद्ध फतवे निकाल दिये जाते है ... हिन्दुओ के ही देश में,भारत भूमि पर ही , हिन्दुओ के ही भगवान श्री राम का , उन्ही की जन्मभूमि पर एक मंदिर तक नहीं बन पा रहा, रामनवमी तक पर रोक के लिए किसी इस्लामी कीड़े द्वारा घोषणा कर दी जाती है, सफ़ेद टोपी छुट-पुट दाढ़ी रखने वालो द्वारा जो भीषण आघात व प्रहार सनातन धर्म पर किया जा रहा है वो प्रत्यक्ष है... ... इसे नहीं तो और किसे धर्म की दुर्गति कहा जाएगा? और हिन्दुओ के बहुसंख्यक होने की स्थिति में भी ऐसा होने के अनेक कारण है किन्तु उनमे से एक मुख्य कारण है है - कि ऐसी घोर विषम परिस्थितियो में भी देश के अधिकांश कथित भक्त राधे राधे राधे राधे करते हुये सामूहिक नृत्य कर रहे है...

राधे राधे राधे राधे राधे....... ये राधे राधे बोलने वाली कौम कभी किसी मोर्चे पर फतह हासिल नहीं कर सकती..... जिन्हे ये सिखा दिया गया हो कि राधे राधे बोलने मात्र से ही कल्याण हो जाएगा .... तो वो क्यो धर्मोत्थान एवं धर्म की रक्षा के लिए संघर्ष करना चाहेंगे? सीधी सी बात है कृष्ण जी भी मुरली बजाते थे न पर जब धर्म पर बात आई तो मूरली को एकतरफ रखके सुदर्शन हाथ मे लिया था न ....
ये नाचने मटकने वाली जनता... किस तरह इन कुधर्मियों से मुक़ाबला कर पाएगी?

अर्जुन ने दुर्योधन आदि कौरवो को तथा अन्य दुष्टो को राधे राधे बोलते हुये मारा था क्या.... वीर शिवाजी महाराज ने राधे राधे करते हुये मुगलो को काटकर इस राष्ट्र और हिन्दुओ की रक्षा की थी क्या.... गुरु गोविंद सिंह जी सहित अनेकों गुरुओ ने राधे राधे बोलते हुये अपने सर कटवाए थे क्या.....असंख्यों क्रांतिकारियों मे से किसी एक ने भी राधे राधे बोलते हुये अंग्रेज़ो से लोहा लिया था क्या?गुजरात के वीर हिन्दुओ ने राधे राधे बोलते हुये मुस्लिम म्लेक्षों को आग में भूना था क्या? क्या कोई ऐसा धर्मयोद्धा अथवा राष्ट्रभक्त अथवा महानभक्त ही सही, आज तक के इतिहास में इस धरती पर हुआ है जिसने राधे राधे बोलते हुये ,धर्मरक्षा अथवा राष्ट्ररक्षा मे योगदान भी दिया हो ????

सर्वथा आप्तकाम,योगेश्वर , धर्म-संस्थापक , दुष्ट-संघारक ,परमज्ञेय श्री कृष्ण भगवान जिन्होने जीवन भर कर्म से कर्म मे ही बरता, परमचरित्रवान जिन्होने पूरे जीवन काल मे कोई अधर्म नहीं किया,कोई अनैतिक कार्य नहीं किया, जिनका चरित्र दोपहर के सूर्य से भी अधिक स्वच्छ, प्रखर और निर्मल है उन अखिलेश्वर भगवान श्री कृष्ण को तुमने मात्र नाचने-गाने-बजाने वाले बना के रख दिया...मात्र रास रचाने वाले, कपड़े चुराने वाले, सामाजिक मर्यादा के विरुद्ध कर्म करने वाला बना डाला....श्री कृष्ण का नाम लेकर दुकान चलाने वालो क्या तुमने श्री कृष्ण के साथ विश्वासघात नहीं किया? प्रत्येक धर्मद्रोही विवाद होने पर श्री कृष्ण के उन्ही प्रसंगो को लाकर मुंह पर मारता है जो तुम्हारे द्वारा भक्ति के नाम पर हस कर खुश होकर मस्ती से झूमते हुये सुनाये जाते है...श्री कृष्ण जैसी दिव्य विभूति के चरित्र को कलंकित करने मे सबसे बड़ा योगदान तुम्हारा ही है....तो मे क्यो न इसे कृष्ण द्रोह और विश्वासघात का नाम दू? इस तरह के जितने भी प्रसंग है जो श्री कृष्ण की छवि को कलंकित करते है , ये सब मिथ्या काल्पनिक और गप्प मात्र है...अपने अपने स्वार्थो के लिए जोड़ दिये गए है .. श्री कृष्ण ने ऐसा कोई काम किया ही नहीं है कि कोई उनके ऊपर एक उंगली तक उठा सके...और ये बात में हवा मे नहीं कह रहा....अगर इनमे से किसी धर्मध्वजी मे दम है तो आए सामने, मे पूर्णतः प्रमाणो, तर्को एवं तथ्यो के आधार पर अपनी बात सिद्ध करके दिखा सकता हू.... पर ये , इन बातौ को नहीं बताएँगे क्यो कि अगर ये सच बोल बैठे तो फिर इनका तो बिजनेस ही ठंडा पड जाएगा न ...वैसे भी इन्हे भक्त नहीं अपने पांडालो मे भीड़ ही चाहिए...

मेरी किसी बात से अगर किसी को ठेस पहुचती है तो मे इसका जिम्मेदार बिलकुल नहीं हू...तुम्हारी भावनाए इतनी आहत नहीं हो सकती जितनी मेरी होती है तुम्हारे द्वारा |

श्री कृष्ण को बदनाम किया जाता देखकर...जिसमे विरोध ज्यादा हो किन्तु भीतर मे हित छिपा हो, ऐसा सच बोलने के लिए कलेजा चाहिए होता है...धर्म, ईश्वर और सत्य के मामले मे कोई समझौता नहीं, कोई कंप्रोमाईज़ नहीं...धर्मज्ञ बनो, श्रेष्ठकर्मवान बनो, निर्भीक बनो, सत्यवादी बनो, ईश्वर के सच्चे प्रेमी और भक्त बनो, तब होगा कल्याण.........जय श्री कृष्ण....... जय श्री राम

Tuesday, October 30, 2012

राजयोग

            महर्षि पतं‍जलि के योग को ही अष्टांग योग या राजयोग कहा जाता है। योग के उक्त आठ अंगों में ही सभी तरह के योग का समावेश हो जाता है। भगवान बुद्ध का आष्टांगिक मार्ग भी योग के उक्त आठ अंगों का ही हिस्सा है। 

अष्टांग योग : इसी योग का सर्वाधिक प्रचलन और महत्व है। इसी योग को हम अष्टांग योग योग के नाम से जानते हैं। अष्टांग योग अर्थात योग के आठ अंग। दरअसल पतंजल‍ि ने योग की समस्त विद्याओं को आठ अंगों में श्रेणीबद्ध कर दिया है। लगभग 200 ईपू में महर्षि पतंजलि ने योग को लिखित रूप में संग्रहित किया और योग-सूत्र की रचना की। योग-सूत्र की रचना के कारण पतंजलि को योग का पिता कहा जाता है।

यह आठ अंग हैं- (1)यम (2)नियम (3)आसन (4) प्राणायाम (5)प्रत्याहार (6)धारणा (7) ध्यान (8)समाधि। उक्त आठ अंगों के अपने-अपने उप अंग भी हैं। वर्तमान में योग के तीन ही अंग प्रचलन में हैं- आसन, प्राणायाम और ध्यान।

योग सूत्र : 200 ई.पू. रचित महर्षि पतंजलि का 'योगसूत्र' योग दर्शन का प्रथम व्यवस्थित और वैज्ञानिक अध्ययन है। योगदर्शन इन चार विस्तृत भाग, जिन्हें इस ग्रंथ में पाद कहा गया है, में विभाजित है- समाधिपाद, साधनपाद, विभूतिपाद तथा कैवल्यपाद।

प्रथम पाद का मुख्य विषय चित्त की विभिन्न वृत्तियों के नियमन से समाधि के द्वारा आत्म साक्षात्कार करना है। द्वितीय पाद में पाँच बहिरंग साधन- यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार का विवेचन है। तृतीय पाद में अंतरंग तीन धारणा, ध्यान और समाधि का वर्णन है। इसमें योगाभ्यास के दौरान प्राप्त होने वाली विभिन्न सिद्धियों का भी उल्लेख हुआ है, किन्तु ऋषि के अनुसार वे समाधि के मार्ग की बाधाएँ ही हैं। चतुर्थ कैवल्यपाद मुक्ति की वह परमोच्च अवस्था है, जहाँ एक योग साधक अपने मूल स्रोत से एकाकार हो जाता है।

दूसरे ही सूत्र में योग की परिभाषा देते हुए पतंजलि कहते हैं- 'योगाश्चित्त वृत्तिनिरोधः'। अर्थात योग चित्त की वृत्तियों का संयमन है। चित्त वृत्तियों के निरोध के लिए महर्षि पतंजलि ने द्वितीय और तृतीय पाद में जिस अष्टांग योग साधन का उपदेश दिया है, उसका संक्षिप्त परिचय निम्नानुसार है:-

1).यम: कायिक, वाचिक तथा मानसिक इस संयम के लिए अहिंसा, सत्य, अस्तेय चोरी न करना, ब्रह्मचर्य जैसे अपरिग्रह आदि पाँच आचार विहित हैं। इनका पालन न करने से व्यक्ति का जीवन और समाज दोनों ही दुष्प्रभावित होते हैं।
(2).नियम: मनुष्य को कर्तव्य परायण बनाने तथा जीवन को सुव्यवस्थित करते हेतु नियमों का विधान किया गया है। इनके अंतर्गत शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय तथा ईश्वर प्रणिधान का समावेश है। शौच में बाह्य तथा आन्तर दोनों ही प्रकार की शुद्धि समाविष्ट है।
(3).आसन: पतंजलि ने स्थिर तथा सुखपूर्वक बैठने की क्रिया को आसन कहा है। परवर्ती विचारकों ने अनेक आसनों की कल्पना की है। वास्तव में आसन हठयोग का एक मुख्य विषय ही है। इनसे संबंधित 'हठयोग प्रतीपिका' 'घरेण्ड संहिता' तथा 'योगाशिखोपनिषद्' में विस्तार से वर्णन मिलता है।
(4).प्राणायाम: योग की यथेष्ट भूमिका के लिए नाड़ी साधन और उनके जागरण के लिए किया जाने वाला श्वास और प्रश्वास का नियमन प्राणायाम है। प्राणायाम मन की चंचलता और विक्षुब्धता पर विजय प्राप्त करने के लिए बहुत सहायक है।
(5).प्रत्याहार: इंद्रियों को विषयों से हटाने का नाम ही प्रत्याहार है। इंद्रियाँ मनुष्य को बाह्यभिमुख किया करती हैं। प्रत्याहार के इस अभ्यास से साधक योग के लिए परम आवश्यक अन्तर्मुखिता की स्थिति प्राप्त करता है।
(6).धारणा: चित्त को एक स्थान विशेष पर केंद्रित करना ही धारणा है।
(7).ध्यान: जब ध्येय वस्तु का चिंतन करते हुए चित्त तद्रूप हो जाता है तो उसे ध्यान कहते हैं। पूर्ण ध्यान की स्थिति में किसी अन्य वस्तु का ज्ञान अथवा उसकी स्मृति चित्त में प्रविष्ट नहीं होती।
(8).समाधि: यह चित्त की अवस्था है जिसमें चित्त ध्येय वस्तु के चिंतन में पूरी तरह लीन हो जाता है। योग दर्शन समाधि के द्वारा ही मोक्ष प्राप्ति को संभव मानता है।

समाधि की भी दो श्रेणियाँ हैं : सम्प्रज्ञात और असम्प्रज्ञात। सम्प्रज्ञात समाधि वितर्क, विचार, आनंद और अस्मितानुगत होती है। असम्प्रज्ञात में सात्विक, राजस और तामस सभी वृत्तियों का निरोध हो जाता है।

३३ कोटि देवता

                                                         गलतफहमी

 हिन्दू धर्म में 33 करोड़ देवी-देवता हैं. ??

लोगों को इस बात की बहुत बड़ी गलतफहमी है कि...... हिन्दू सनातन धर्म में 33 करोड़ देवी-देवता हैं...!
लेकिन ऐसा है नहीं..... और, सच्चाई इसके बिलकुल ही विपरीत है...!

दरअसल.... हमारे वेद

ों में उल्लेख है .... 33""कोटि"" देवी-देवता..!
अब ""कोटि"" का अर्थ""प्रकार"" भी होता है.. और ............ ""करोड़"" भी...!

तो... मूर्खों ने उसे हिंदी में.... करोड़ पढना शुरू कर दिया...... जबकि वेदों का तात्पर्य ..... 33 कोटि... अर्थात ..... 33 प्रकार के देवी-देवताओं से है...(उच्च कोटि.. निम्न कोटि..... इत्यादि शब्दतो आपने सुना ही होगा.... जिसका अर्थ भीकरोड़ ना होकर..प्रकार होता है)

ये एक ऐसी भूल है.... जिसने वेदों में लिखे पूरे अर्थ को ही परिवर्तित कर दिया....!
इसे आप इस निम्नलिखित उदहारण से और अच्छी तरह समझ सकते हैं....!
--------------- ------
अगर कोई कहता है कि......बच्चों को""कमरे में बंद रखा"" गया है...!
और दूसरा इसी वाक्य की मात्रा को बदल कर बोले कि...... बच्चों को कमरे में "" बंदर खा गया"" है.....!! (बंद रखा= बंदर खा)
--------------- ------

कुछ ऐसी ही भूल ..... अनुवादकों से हुई ..... अथवा... दुश्मनों द्वारा जानबूझ कर दिया गया.... ताकि, इसे HIGHLIGHT किया जा सके..!

सिर्फ इतना ही नहीं....हमारे धार्मिक ग्रंथों में साफ-साफउल्लेख है कि....""निरंजनो निराकारो..एको देवो महेश्वरः""..... ........ अर्थात.... इस ब्रह्माण्ड में सिर्फ एक ही देव हैं... जो निरंजन...निराका र महादेव हैं...!
साथ ही... यहाँ एक बात ध्यान में रखने योग्य बात है कि..... हिन्दू सनातन धर्म..... मानव की उत्पत्तिके साथ ही बना है..... और प्राकृतिक है...... इसीलिए ... हमारे धर्ममें प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित कर जीना बताया गया है...... और, प्रकृति को भी भगवान की उपाधि दी गयी है..... ताकि लोगप्रकृति के साथ खिलवाड़ ना करें....!
जैसे कि....

@@ गंगा को देवी माना जाता है...... क्योंकि ... गंगाजल में सैकड़ों प्रकार की हिमालय की औषधियां घुली होती हैं..!

@@ गाय को माता कहा जाता है ... क्योंकि .... गाय का दूध अमृततुल्य ... और, उनका गोबर... एवंगौ मूत्र में विभिन्न प्रकार की... औषधीय गुण पाए जाते हैं...!

@@ तुलसी के पौधे को भगवान इसीलिए माना जाता है कि.... तुलसी के पौधे के हर भाग में विभिन्न औषधीय गुण हैं...!

@@ इसी तरह ... वट और बरगद के वृक्ष घने होने के कारण ज्यादा ऑक्सीजन देते हैं.... और, थके हुए राहगीर को छाया भी प्रदान करते हैं...!

यही कारण है कि.... हमारे हिन्दू धर्म ग्रंथों में ..... प्रकृति पूजा को प्राथमिकता दी गयी है.....क्योंकि, प्रकृति से ही मनुष्य जाति है.... ना कि मनुष्य जाति से प्रकृति है..!
अतः.... प्रकृति को धर्म से जोड़ा जाना और उनकी पूजा करना सर्वथा उपर्युक्त है.... !
यही कारण है कि........ हमारे धर्म ग्रंथों में.... सूर्य, चन्द्र...वरुण.... वायु.. अग्नि को भी देवता माना गया है.... और, इसी प्रकार..... कुल 33 प्रकार के देवी देवता हैं...!
इसीलिए, आपलोग बिलकुल भी भ्रम में ना रहें...... क्योंकि... ब्रह्माण्ड में सिर्फ एक ही देव हैं... जो निरंजन...निराका र महादेव हैं...! —

.अतः कुल 33 प्रकार के देवता हैं......

12 आदित्य है ----->धाता,मित्, अर्यमा,शक्र,वरुण,अंश,भग , विवस्वान,पूषा,सविता,त्वष्टा,एवं विष्णु..!

8 वसु हैं......धर,ध्रुव,सोम,अह,अनिल,अनल,प्रत्युष,एवं.,प्रभाष

11 रूद्र हैं...हर ,बहुरूप.त्र्यम्बक.अपराजिता.वृषाकपि .शम्भू.कपर्दी..रेवत ..म्रग्व्यध.शर्व..तथा.कपाली.

2 अश्विनी कुमार हैं.....

कुल................12 +8 +11 +2 =33

Monday, September 3, 2012


  
                                                            दस महाविद्या...
महाविद्या अर्थात महान विद्या [ज्ञान] रूपी देवी...
त्रिगुणात्मक शक्ति रूपी नवदुर्गा की एक और विशेषता है, जोकि उनके आध्यात्मिक स्वरूप में दस महाविद्याओं के रूप में विराजमान है...
* ब्रह्माजी पुत्र दत्तात्रेय ने तंत्र शास्त्र के निगमागम ग्रंथों की रचना करते हुए महिषासुर मर्दिनी और सिद्धिदात्री देवी भगवती के अंदर समाहित उन दस महाविद्याओं का जिक्र किया है, जिनकी साधना से ऋषि मुनि और विद्वान इस संसार में चमत्कारी शक्तियों से युक्त होते हैं।
* मार्कण्डेय पुराण में दस महाविद्याओं का और उनके मंत्रों का तथा यंत्रो का जो जिक्र है उसे संक्षेप में यहां प्रस्तुत किया जा रहा है...
काली तारा महाविद्या षोडषी भुवनेश्वरी,भैरवी छिन्नमस्ता च विद्या धूमावती तथा |बगला सिद्धविद्या च मातंगी कमलात्मिका ,एता दशमहाविद्याःसिद्विद्याः प्रकीर्तिताः||
दस महाविद्याओं के नाम हैं : महाकाली , तारा , त्रिपुर सुंदरी , भुवनेश्वरी , छिन्नमस्ता , षोडषी , धूमावती , बगलामुखी , मातंगी , और कमला। जैसे कि कहा गया है :
या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता |नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ||
देवी दुर्गा के आभामंडल में उपरोक्त दस महाविद्याएं दस प्रकार की शक्तियों के प्रतीक हैं। सृष्टि के क्रम में चारों युग में यह दस महाविद्याएं विराजमान रहती हैं। इनकी साधना कल्प वृक्ष के समान शीघ्र फलदायक और साधक की सभी कामनाओं को पूर्ण करने में सहायक होती हैं। नवरात्र में सिद्धि और तंत्र शास्त्र के मर्मज्ञ इनकी साधना करने के लिए हिमालय से लेकर पूर्वांचल बंगाल आदि प्रान्तों में अपने तप बल से साधनारत होकर इनके स्वरूप का मंत्र जाप करते हैं।
दस महाविद्याओं का वर्णन इस प्रकार से है :
1) महाकाली : महाविनाशक महाकाली, जहां रक्तबीज का वध करती हैं, वहां अपने साधकों को अपार शक्ति देकर मां भगवती की कृपा से सबल और सक्षम बनाती हैं। यह कज्जल पर्वत के समान शव पर आरूढ़ मुंडमाला धारण किए हुए एक हाथ में खड्ग दूसरे हाथ में त्रिशूल और तीसरे हाथ में कटे हुए सिर को लेकर भक्तों के समक्ष प्रकट हो जाती हैं। यह महाकाली एक प्रबल शत्रुहन्ता महिषासुर मर्दिनी और रक्तबीज का वध करने वाली शिव प्रिया चामुंडा का साक्षात स्वरूप है, जिसने देव दानव युद्ध में देवताओं को विजय दिलवाई है।
2) तारा : शत्रुओं का नाश करने वाली सौन्दर्य और रूप ऐश्वर्य की देवी तारा आर्थिक उन्नति और भोग दान और मोक्ष की प्राप्ति के लिए जानी जाती हैं। भगवती तारा के तीन स्वरूप हैं। तारा , एकजटा और नील सरस्वती। चैत्र मास की नवमी तिथि और शुक्ल पक्ष के दिन तारा रूपी देवी की साधना करना तंत्र साधकों के लिए सर्वसिद्धिकारक माना गया है। तारा महाविद्या के फलस्वरूप व्यक्ति इस संसार में व्यापार रोजगार और ज्ञान-विज्ञान से परिपूर्ण विख्यात यश वाला प्राणी बन सकता है।
3) त्रिपुर सुन्दरी : शांत और उग्र दोनों की स्वरूपों में मां त्रिपुर सुन्दरी की साधना की जाती है। त्रिपुर सुन्दरी के अनेक रूप हैं। मसलन , सिद्धि भैरवी , रूद्र भैरवी , कामेश्वरी आदि। जीवन में काम, सौभाग्य और शारीरिक सुख के साथ वशीकरण आरोग्य सिद्धि के लिए इस देवी की आराधना की जाती है। कमल  पुष्पों से होम करने से धन सम्पदा की प्राप्ति होती है। मनोवांछित वर या कन्या से विवाह होता है। वांछित सिद्धि और मनोअभिलाषापूर्ति सहित व्यक्ति दुख से रहित और सर्वत्र पूज्य होता है।

4) भुवनेश्वरी : आदि शक्ति भुवनेश्वरी भगवान शिव की समस्त लीला विलास की सहचरी हैं। मां का स्वरूप सौम्य एवं अंग कांति अरूण हैं। भक्तों को अभय एवं सिद्धियां प्रदान करना इनका स्वभाविक गुण है। इस महाविद्या की आराधना से जहां साधक के अंदर सूर्य के समान तेज और ऊर्जा प्रकट होने लगती है, वहां वह संसार का सम्राट भी बन सकता है। इसको अभिमंत्रित करने से लक्ष्मी वर्षा होती है और संसार के सभी शक्ति स्वरूप महाबली उसका चरणस्पर्श करते हैं।
5) छिन्नमस्ता : विश्व की वृद्धि और उसका ह्रास सदैव होता रहता है। जब निर्गम अधिक और आगम कम होता है , तब छिन्नमस्ता का प्राधान्य होता है। माता का स्वरूप अतयंत गोपनीय है। चतुर्थ संध्याकाल में मां छिन्नमस्ता की उपासना से साधक को सरस्वती सिद्ध हो जाती है। कृष्ण और रक्त गुणों की देवियां इनकी सहचरी हैं। पलास और बेलपत्रों से छिन्नमस्ता महाविद्या की सिद्धि की जाती है। इससे प्राप्त सिद्धियां मिलने से लेखन और कवित्व शक्ति की वृद्धि होती है । शरीर रोग मुक्त होता है। शत्रु परास्त होते हैं। योग ध्यान और शास्त्रार्थ में साधक को संसार में ख्याति मिलती है।
6) षोडशी : सोलह अक्षरों के मंत्र वाली माता की अंग कांति उदीयमान सूर्य मंडल की आभा की भांति है। इनकी चार भुजाएं और तीन नेत्र हैं। षोडशी को श्री विद्या भी माना जाता है। यह साधक को युक्ति और मुक्ति दोनों ही प्रदान करती है। इसकी साधना से षोडश कला निपुण सन्तान की प्राप्ति होती है। जल, थल और नभ में उसका वर्चस्व कायम होता है। आजीविका और व्यापार में इतनी वृद्धि होती है कि व्यक्ति संसार भर में धन श्रेष्ठ यानि सर्वाधिक धनी बनकर सुख भोग करता है।
7) धूमावती : मां धूमावती महाशक्ति स्वयं नियंत्रिका हैं। इनका स्वामी नहीं है। ऋग्वेद में रात्रिसूक्त में इन्हें ' सुतरा ' कहा गया है। अर्थात ये सुखपूर्वक तारने योग्य हैं। इन्हें अभाव और संकट को दूर करने वाली मां कहा गया है। इस महाविद्या की सिद्धि के लिए तिल मिश्रित घी से होम किया जाता है। धूमावती महा विद्या के लिए यह भी जरूरी है कि व्यक्ति सात्विक और नियम संयम और सत्यनिष्ठा को पालन करने वाला लोभ लालच से रहित हो इस महाविद्या के फल से देवी धूमावती सूकरी के रूप में प्रत्यक्ष प्रकट होकर साधक के सभी रोग अरिष्ट और शत्रुओं का नाश कर देती है। प्रबल महाप्रतापी तथा सिद्ध पुरूष के रूप में उस साधक की ख्याति हो जाती है।
8) बगलामुखी : व्यक्ति रूप में शत्रुओं को नष्ट करने वाली समष्टि रूप में परमात्मा की संहार शक्ति ही बगला है। इनकी साधना शत्रु भय से मुक्ति और वाक् सिद्धि के लिए की जाती है। पीतांबरा माला पर विधि - विधान के साथ जाप करें - दस महावद्याओं में बगला मुखी सबसे अधिक प्रयोग में लाई जाने वाली महाविद्या है, जिसकी साधना सप्तऋषियों ने वैदिक काल में समय समय पर की है। इसकी साधना से जहां घोर शत्रु अपने ही विनाश बुद्धि से पराजित हो जाते हैं वहां साधक का जीवन निष्कंटक तथा लोकप्रिय बन जाता है।
9) मातंगी : मतंग शिव का नाम है। इनकी शक्ति मातंगी है । यह श्याम वर्ण और चन्द्रमा को मस्तक पर धारण करती हैं। यह पूर्णतया वाग्देवी की ही पूर्ति हैं। चार भुजाएं चार वेद हैं। मां मातंगी वैदिकों की सरस्वती हैं। पलास और मल्लिका पुष्पों से युक्त बेलपत्रों की पूजा करने से व्यक्ति के अंदर आकर्षण और स्तम्भन शक्ति का विकास होता है। ऐसा व्यक्ति जो मातंगी महाविद्या की सिद्धि प्राप्त करेगा, वह अपने क्रीड़ा कौशल से या कला संगीत से दुनिया को अपने वश में कर लेता है। वशीकरण में भी यह महाविद्या कारगर होती है।
10) कमला : कमला की कांति सुवर्ण के समान है। श्वेत वर्ण के चार हाथी सूंड में सुवर्ण कलश लेकर मां को स्नान करा रहे हैं। कमल पर आसीन कमल पुष्प धारण किए हुए मां सुशोभित होती हैं। समृद्धि की प्रतीक , स्थिर लक्ष्मी की प्राप्ति , नारी , पुत्रादि के लिए इनकी साधना की जाती है ।
इस प्रकार दस महामाताएं गति , विस्तर , भरण - पोषण , जन्म - मरण , बंधन और मोक्ष की प्रतीक हैं। इस महाविद्या की साधना नदी तालाब या समुद्र में गिरने वाले जल में आकंठ डूब कर की जाती है। इसकी पूजा करने से व्यक्ति साक्षात कुबेर के समान धनी और विद्यावान होता है। व्यक्ति का यश और व्यापार या प्रभुत्व संसांर भर में प्रचारित हो जाता है।                                              
   

ॐ सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके |                                                                                                                शरण्ये त्रियाम्बके देवी नारायणी नमोस्तुते ||

                                                जय माता दी...