Sunday, November 18, 2012

धर्म का मर्म


धर्मनिरपेक्षता, सर्वधर्मसमभाव का नारा देने वाले, कथाओ के बीच भरी भीड़ में औरतों को नचाने वाले धर्मध्वजी? नाचना-गाना-मटकना तो सिखा सकते है पर कभी जनता को धर्म के वास्तविक स्वरूप से परिचित नहीं करा सकते...

भगवान के तथाकथित प्रेमप्रसंगो को चट

कारे लगा लगाकर सुनाने वाले, एवं सिर्फ श्रवण-वर्णन ,गायन,नृत्य मात्र से ही ईश्वर की प्राप्ति कराने का दावा करने वाले पहले स्वयं भगवान को प्राप्त क्यो नहीं करके दिखाते ? क्यो कि हमारे ही ग्रंथ चीख चीखकर कहते है की कर्मविहीन, कर्तव्यविहीन भक्ति कभी भगवान की प्राप्ति नहीं करा सकती ...अर्जुन भी अगर धर्मयुद्ध छोडकर, सिर्फ पूजा-पाठ में ही लग जाते जैसा की अर्जुन ने स्वयं कहा भी था तो क्या श्री कृष्ण के परमप्रिय बन पाते? श्री कृष्ण ने मना किया था न....पर ये नहीं बताते इस बात को ....क्यो नहीं बताते? भैया दुकान कैसे चलेगी फिर???

में सिर्फ एक बात पुछना चाहता हूँ - श्रीमद भागवत कथा को 7 दिन सुनने के पश्चात ही जब परीक्षित जी का कल्याण हो गया था,और सात दिन में ही परमगति को,परमशांति को परमानंद को मनुष्य प्राप्त कर लेता है , भागवत मे भी कहा गया है तो आजकल तो प्रतिदिन ही हजारो स्थानो पर प्रतिदिन ही कथाये हो रही है न ... कितनों का कल्याण हो रहा है ? इसे छोड़िए जो कथाये कर रहे है उन्ही का कल्याण हो रहा है क्या?(पैसो को छोडकर).... अरे यहा कथावाचकों की उम्र निकल जाती है, पूरे जीवन में सौ से ज्यादा कथाए कर डालते है तो जब स्वयं उनका ही कल्याण नहीं हो रहा तो??
और क्यो नहीं हो रहा इसके अनेक कारण है जैसे कि कथाओ में चालीस प्रतिशत बाते तो ऐसी बोली जाती है जो भागवत में होती तक नहीं है, सिर्फ इधर उधर से लाकर कहानिया जोड़ दी जाती है...दूसरा एक ओर तो कहते है कि हे ...हे... हे....!!! हमे मुक्ति नही चाहिए हमे तो भक्ति मे ही आनंद मिलता है - अरे अगर ऐसा ही है मुक्ति चाहिए ही नहीं तो एक कथा मे दस दस बार क्यो कहते हो कि भागवत सुन लो मुक्ति ले लो , क्यो बोली लगाते हो मुक्ति की? और इसी वाक्य का सार निकाल दिया कि सुनने मात्र से ही मुक्ति मिल जाएगी भक्तजनों, सारी इच्छाए पूरी हो जाएगी, भगवान प्रसन्न हो जाएँगे...बाकी कुछ करने की जरूरत ही नहीं है , भगवान श्री कृष्ण को इनके बराबर ज्ञान नहीं था जो गीता बोली जीवन भर कर्म और धर्म का पालन करके हमे शिक्षा देकर गए , ये नहीं सिखाते .. तो कैसे होगा कल्याण ?

आज प्रतिदिन हजारो की संख्या मे गोमाताए काट काटकर, भूनकर, पेक करके फैला दी जाती है जीभ का स्वाद पूरा करने के लिए.... गोमाता के बछड़ो तक को जीवित, खौलते पानी मे उबालकर उनकी खाल जूते-चप्पल बनाने के लिए खीची जाती है.....अनेक स्थानो पर हिन्दू लड़कियो को प्रेम जाल मे फसाकर अथवा बलात्कार आदि करके उन्हे मुस्लिम बनने पर मजबूर किया जाता है, आए दिन सनातन वैदिक धर्म के विरुद्ध फतवे निकाल दिये जाते है ... हिन्दुओ के ही देश में,भारत भूमि पर ही , हिन्दुओ के ही भगवान श्री राम का , उन्ही की जन्मभूमि पर एक मंदिर तक नहीं बन पा रहा, रामनवमी तक पर रोक के लिए किसी इस्लामी कीड़े द्वारा घोषणा कर दी जाती है, सफ़ेद टोपी छुट-पुट दाढ़ी रखने वालो द्वारा जो भीषण आघात व प्रहार सनातन धर्म पर किया जा रहा है वो प्रत्यक्ष है... ... इसे नहीं तो और किसे धर्म की दुर्गति कहा जाएगा? और हिन्दुओ के बहुसंख्यक होने की स्थिति में भी ऐसा होने के अनेक कारण है किन्तु उनमे से एक मुख्य कारण है है - कि ऐसी घोर विषम परिस्थितियो में भी देश के अधिकांश कथित भक्त राधे राधे राधे राधे करते हुये सामूहिक नृत्य कर रहे है...

राधे राधे राधे राधे राधे....... ये राधे राधे बोलने वाली कौम कभी किसी मोर्चे पर फतह हासिल नहीं कर सकती..... जिन्हे ये सिखा दिया गया हो कि राधे राधे बोलने मात्र से ही कल्याण हो जाएगा .... तो वो क्यो धर्मोत्थान एवं धर्म की रक्षा के लिए संघर्ष करना चाहेंगे? सीधी सी बात है कृष्ण जी भी मुरली बजाते थे न पर जब धर्म पर बात आई तो मूरली को एकतरफ रखके सुदर्शन हाथ मे लिया था न ....
ये नाचने मटकने वाली जनता... किस तरह इन कुधर्मियों से मुक़ाबला कर पाएगी?

अर्जुन ने दुर्योधन आदि कौरवो को तथा अन्य दुष्टो को राधे राधे बोलते हुये मारा था क्या.... वीर शिवाजी महाराज ने राधे राधे करते हुये मुगलो को काटकर इस राष्ट्र और हिन्दुओ की रक्षा की थी क्या.... गुरु गोविंद सिंह जी सहित अनेकों गुरुओ ने राधे राधे बोलते हुये अपने सर कटवाए थे क्या.....असंख्यों क्रांतिकारियों मे से किसी एक ने भी राधे राधे बोलते हुये अंग्रेज़ो से लोहा लिया था क्या?गुजरात के वीर हिन्दुओ ने राधे राधे बोलते हुये मुस्लिम म्लेक्षों को आग में भूना था क्या? क्या कोई ऐसा धर्मयोद्धा अथवा राष्ट्रभक्त अथवा महानभक्त ही सही, आज तक के इतिहास में इस धरती पर हुआ है जिसने राधे राधे बोलते हुये ,धर्मरक्षा अथवा राष्ट्ररक्षा मे योगदान भी दिया हो ????

सर्वथा आप्तकाम,योगेश्वर , धर्म-संस्थापक , दुष्ट-संघारक ,परमज्ञेय श्री कृष्ण भगवान जिन्होने जीवन भर कर्म से कर्म मे ही बरता, परमचरित्रवान जिन्होने पूरे जीवन काल मे कोई अधर्म नहीं किया,कोई अनैतिक कार्य नहीं किया, जिनका चरित्र दोपहर के सूर्य से भी अधिक स्वच्छ, प्रखर और निर्मल है उन अखिलेश्वर भगवान श्री कृष्ण को तुमने मात्र नाचने-गाने-बजाने वाले बना के रख दिया...मात्र रास रचाने वाले, कपड़े चुराने वाले, सामाजिक मर्यादा के विरुद्ध कर्म करने वाला बना डाला....श्री कृष्ण का नाम लेकर दुकान चलाने वालो क्या तुमने श्री कृष्ण के साथ विश्वासघात नहीं किया? प्रत्येक धर्मद्रोही विवाद होने पर श्री कृष्ण के उन्ही प्रसंगो को लाकर मुंह पर मारता है जो तुम्हारे द्वारा भक्ति के नाम पर हस कर खुश होकर मस्ती से झूमते हुये सुनाये जाते है...श्री कृष्ण जैसी दिव्य विभूति के चरित्र को कलंकित करने मे सबसे बड़ा योगदान तुम्हारा ही है....तो मे क्यो न इसे कृष्ण द्रोह और विश्वासघात का नाम दू? इस तरह के जितने भी प्रसंग है जो श्री कृष्ण की छवि को कलंकित करते है , ये सब मिथ्या काल्पनिक और गप्प मात्र है...अपने अपने स्वार्थो के लिए जोड़ दिये गए है .. श्री कृष्ण ने ऐसा कोई काम किया ही नहीं है कि कोई उनके ऊपर एक उंगली तक उठा सके...और ये बात में हवा मे नहीं कह रहा....अगर इनमे से किसी धर्मध्वजी मे दम है तो आए सामने, मे पूर्णतः प्रमाणो, तर्को एवं तथ्यो के आधार पर अपनी बात सिद्ध करके दिखा सकता हू.... पर ये , इन बातौ को नहीं बताएँगे क्यो कि अगर ये सच बोल बैठे तो फिर इनका तो बिजनेस ही ठंडा पड जाएगा न ...वैसे भी इन्हे भक्त नहीं अपने पांडालो मे भीड़ ही चाहिए...

मेरी किसी बात से अगर किसी को ठेस पहुचती है तो मे इसका जिम्मेदार बिलकुल नहीं हू...तुम्हारी भावनाए इतनी आहत नहीं हो सकती जितनी मेरी होती है तुम्हारे द्वारा |

श्री कृष्ण को बदनाम किया जाता देखकर...जिसमे विरोध ज्यादा हो किन्तु भीतर मे हित छिपा हो, ऐसा सच बोलने के लिए कलेजा चाहिए होता है...धर्म, ईश्वर और सत्य के मामले मे कोई समझौता नहीं, कोई कंप्रोमाईज़ नहीं...धर्मज्ञ बनो, श्रेष्ठकर्मवान बनो, निर्भीक बनो, सत्यवादी बनो, ईश्वर के सच्चे प्रेमी और भक्त बनो, तब होगा कल्याण.........जय श्री कृष्ण....... जय श्री राम

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