उत्पन्नशक्तिबोधस्य त्यक्तनि: शेषकर्मण: | योगिनः सहजावस्था स्वयमेव प्रजायते || सुषुम्नावाहिनि प्राणे शून्ये विशति मानसे | तदा सर्वाणि कर्माणि निर्मूलयति योगवित् ||
शक्ति -बोध की उत्पत्ति और सर्व कर्मो का त्याग होने पर योगी को सहजावस्था की प्राप्ति स्वयं ही हो जाती है |जब प्राण सुषुम्ना में प्रवाहित होता और मन शून्य में चला जाता है ,तब योग का ज्ञाता साधक अपने सब कर्मो को निर्मूल कर लेता है |
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अमराय नमस्तुभ्यं सोऽपि कालस्त्वया जित: | पतित: वदने यस्य जगदेतच्चराचरम् |
चित्ते समत्वमापन्ने वायो: व्रजति मध्यमे | तदामरौली वज्रौली सहजोली प्रजायते |
उस अमर को नमस्कार है , जिसने उस काल को भी जीत लिया है , जिसके मुख में यह चराचर जगत पड़ा हुआ है | जब चित्त समत्व को प्राप्त हो जाता है और वायु सुषुम्ना में पहुँच जाती हैं ,तब अमरोली ,वज्रोली ,सहजोली मुद्राएँ सिद्ध होती हैं |
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ज्ञानं कुतो मानसि संभवतीह तावत , प्राणोऽपिजीवति मनो म्रियते न यावत |
प्राणो मनो द्वयमिदं विलयं नयेद्यो, मोक्षं स गच्छति नरो न कथंचिदन्य: ||
जब तक प्राण जीवित रहता है ,तब तक मन भी नहीं मरता, फिर ज्ञान ही कहाँ से होगा | जो पुरुष प्राण और मन दोनों का लय कर देता है ,वही मोक्ष को प्राप्त होता है ,कोई अन्य पुरुष नहीं हो सकता |
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शक्ति -बोध की उत्पत्ति और सर्व कर्मो का त्याग होने पर योगी को सहजावस्था की प्राप्ति स्वयं ही हो जाती है |जब प्राण सुषुम्ना में प्रवाहित होता और मन शून्य में चला जाता है ,तब योग का ज्ञाता साधक अपने सब कर्मो को निर्मूल कर लेता है |
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अमराय नमस्तुभ्यं सोऽपि कालस्त्वया जित: | पतित: वदने यस्य जगदेतच्चराचरम् |
चित्ते समत्वमापन्ने वायो: व्रजति मध्यमे | तदामरौली वज्रौली सहजोली प्रजायते |
उस अमर को नमस्कार है , जिसने उस काल को भी जीत लिया है , जिसके मुख में यह चराचर जगत पड़ा हुआ है | जब चित्त समत्व को प्राप्त हो जाता है और वायु सुषुम्ना में पहुँच जाती हैं ,तब अमरोली ,वज्रोली ,सहजोली मुद्राएँ सिद्ध होती हैं |
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ज्ञानं कुतो मानसि संभवतीह तावत , प्राणोऽपिजीवति मनो म्रियते न यावत |
प्राणो मनो द्वयमिदं विलयं नयेद्यो, मोक्षं स गच्छति नरो न कथंचिदन्य: ||
जब तक प्राण जीवित रहता है ,तब तक मन भी नहीं मरता, फिर ज्ञान ही कहाँ से होगा | जो पुरुष प्राण और मन दोनों का लय कर देता है ,वही मोक्ष को प्राप्त होता है ,कोई अन्य पुरुष नहीं हो सकता |
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