Saturday, December 3, 2011

राजयोग १

                                                                      || ऊँ ||
राजयोग: समाधिश्च उन्मनी च मनोन्तरी |अमरत्वं लायस्तत्वं शुन्याशुन्यं परं पदम् ||
अमरत्वं तथा द्वैतं निरालंबं निरंजनम् |जीवन्मुक्तिश्च सहजा तुर्यां चेत्येकवाचका:  ||

राजयोग ,समाधि ,उन्मनी ,मनोन्तनी ,अमरत्व ,लायतत्व,शुन्या शून्य ,परमपद,अमनस्क ,अद्वैत,निरालंब ,निरंजन,जीवन्मुक्ति,सहजा और तुर्या -यह सब एक के ही वाचक है  | 

सलिले सैन्धवं यद्वत्साम्य भजति योगत : | तथात्ममनसोरैक्यम् समाधिरभिधीयते ||
यदा संक्षीयते प्राणो मानसं च प्रलीयते | तदा समरसत्वं च समाधिरभिधीयते ||
तत्समं च द्वयोरैक्यम् जीवात्मपरमात्मनो :|प्रनष्टसर्वसंकल्प: समाधि: सोsभिधीयते ||

जल में नमक डाल दे तो ,नमक घुल कर जल रूप हो जाता है और तब नमक का पृथक अस्तित्व दिखाई नहीं देता ,वैसे ही मन का आत्मा में लय हो जाने पर समाधि की अवस्था हो जाती है |

समाधि: संविदुत्पत्ति: परजीवैकताम् प्रति |नित्य: सर्वगतो ह्यात्मा कूटस्थो दोषवर्जितः||
यदा सर्वाणि भूतानि समाधिस्थो न पश्यति |एकीभूत: परेणासौ तदा भवति केवलः ||

जीवात्मा और परमात्मा की एकता का ज्ञान होना ही समाधि है, क्योकि आत्मा नित्य ,सर्व व्यापी , कूटस्थ और निर्दोष है |समाधि में रहकर जब सर्वभूतों को नहीं देखता ,वरन् परमात्मा के साथ एक रस हो जाता है ,तब वह केवल परब्रह्मा ही हो जाता है |जीव- ब्रह्मा की एकता का भाव ही समाधि है |

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