ऊँ तत्सत ऊँ
अभ्यासे तु विनिद्राणां मनो धत्वा समधिना , रुद्राणी वा यदा मुद्रा भद्रां सिद्धिं प्रयच्छति !
अभ्यास काल में अनिद्रित रह कर जो साधक मन को समाधि में लीन कर लेते हैं,उन्हे रुद्राणी आदि मुद्राएँ कल्याणमयी होकर सिद्धि को देने वाली होती हैं I
राजयोगं विना पृथ्वी राजयोगं विना निशा , राजयोगं विना मुद्रा विचित्रापि ना शोभते I
राजयोग के बिना आसनादि अंगों की निष्फ़लता कही गयी है , चित्तवृत्ति को अन्य विषयों से रोककर आत्मा में निर्विकल्प रूप से योजित करना ही राजयोग है I
मारूतस्य विधिं सर्व मनोयुक्तं समभ्यसेत् इतरत्र न कर्तव्या मनोवृत्तिर्मनीषिणा ,,इति मुद्रा दश प्रोक्ता आदिनाथेन शंभुना ,एकैका तासु यमिनां महासिद्धिप्रदायिनी I
वायु धारण की सम्पूर्ण विधि का अभ्यास मन लगाकर करें उससे भिन्न किसी भी कार्य में मनीषी पुरुष को मनोवृति नहीं लगानी चाहिए कोई एक मुद्रा अभ्यास भी सिध्दि देने वाली हो सकती है I
अभ्यास काल में अनिद्रित रह कर जो साधक मन को समाधि में लीन कर लेते हैं,उन्हे रुद्राणी आदि मुद्राएँ कल्याणमयी होकर सिद्धि को देने वाली होती हैं I
राजयोगं विना पृथ्वी राजयोगं विना निशा , राजयोगं विना मुद्रा विचित्रापि ना शोभते I
राजयोग के बिना आसनादि अंगों की निष्फ़लता कही गयी है , चित्तवृत्ति को अन्य विषयों से रोककर आत्मा में निर्विकल्प रूप से योजित करना ही राजयोग है I
मारूतस्य विधिं सर्व मनोयुक्तं समभ्यसेत् इतरत्र न कर्तव्या मनोवृत्तिर्मनीषिणा ,,इति मुद्रा दश प्रोक्ता आदिनाथेन शंभुना ,एकैका तासु यमिनां महासिद्धिप्रदायिनी I
वायु धारण की सम्पूर्ण विधि का अभ्यास मन लगाकर करें उससे भिन्न किसी भी कार्य में मनीषी पुरुष को मनोवृति नहीं लगानी चाहिए कोई एक मुद्रा अभ्यास भी सिध्दि देने वाली हो सकती है I
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