Friday, March 16, 2012

अनहद बाजा बाजियाँ चहुँ दिशि भया प्रकाश

नाद दो तरह के होते हैं आहद और अनाहद। आहद का अर्थ दो वस्तुओं के संयोग से उत्पन्न ध्वनि और अनाहद का अर्थ जो स्वयं ही ध्वनित है। जैसे एक हाथ से बजने वाली ताली। ताली तो दो हाथ से ही बजती है तो उसे तो आहद ध्वनि ही कहेंगे।
नाद कहते हैं ध्वनि को। ध्वनि की तरंग को। नाद योग का उद्‍येश्य है आहद से अनाहद की ओर ले जाना। आप पहले एक नाद उत्पन्न करो, फिर उस नाद के साथ अपने मन को जोड़ो। ओम ही है एकमात्र ऐसा प्रणव मंत्र जो आपको अनाहद की ओर ले जा सकता है। यह पुल की तरह है। परमात्मा तत्व को जानने के लिए नादयोग को ही महान बताया गया है। जब किसी व्यक्ति को इसमें सफलता मिलने लगती है, तब उसे नाद सुनाई देता है। नाद का सुनाई देना सिद्धि प्राप्ति का संकेत है। ॐ के उच्चारण का अभ्यास करते-करते एक समय ऐसा आता है जबकि उच्चारण करने की आवश्यकता नहीं होती आप सिर्फ आँखें और कानों को बंद करके भीतर उसे सुनें और वह ध्वनि सुनाई देने लगेगी। भीतर प्रारंभ में वह बहुत ही सूक्ष्म सुनाई देगी फिर बढ़ती जाएगी। यह ध्वनि प्रारंभ में झींगुर की आवाज जैसी सुनाई देगी। फिर धीरे-धीरे जैसे बीन बज रही हो, फिर धीरे-धीरे ढोल जैसी थाप सुनाई देने लग जाएगी, फिर यह ध्वनि शंख जैसी हो जाएगी। प्रत्येक व्यक्ति के भीतर दैवीय शब्द ध्वनित होते रहते हैं, लेकिन व्यक्ति को इतनी भी फुरसत नहीं है कि स्वयं को सुन ले। दिल धड़कता है प्रति मिनट 70 बार लेकिन व्यक्ति उसे सुन ही नहीं पाता। इसी तरह भीतर के बहुत से अँग आपसे बात करना चाहते हैं यह बताने के लिए कि हम ब्रह्मांड की आवाज सुनने की क्षमता रखते हैं, लेकिन जनाब आपको फुरसत ही कहाँ। ॐ किसी शब्द का नाम नहीं है। ॐ एक ध्वनि है, जो किसी ने बनाई नहीं है। यह वह ध्वनि है जो पूरे कण-कण में, पूरे अंतरिक्ष में हो रही है। वेद, गीता, पुराण, , नानक जी की वाणी सभी इसकी गवाह है। इससे सुनने के लिए शुरुआत स्वयं के भीतर से ही करना होगी। ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ आनंद ही आनंद मेरे खुद के अंदर ॐ ॐ ॐ जीतना पास मेरे मेरा राम है और कोई नहीं ..............ॐ ॐ ॐ 

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