Sunday, March 25, 2012

आत्म - ज्ञान का अधिकारी कौन

........................................ आत्म -ज्ञान का अधिकारी ...................................
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आत्म -ज्ञान या आध्यात्मिक विद्या सब विध्याओ में श्रेष्ठ है ! इसलिए इसको महाविद्या भी कहा
गया है ! यह विद्या मृत संजीवनी भी कहलाती है ! अर्थात मृतक को जीवन प्रदान करने वाली विद्या ,
यह परमेश्वर का दर्शन कराती है ! जिव को सभी दुखो से अलग करती है !
इस विद्या के अधिकारी होने के भी कुछ नियम है ! प्रथम 'सत्य' क्योकि सत्य और इश्वर में कोई अंतर नहीं है
सत्य ही इश्वर है और इश्वर ही सत्य है ! इसलिए जो सत्य को धारण करता है , जो सत्य में जीता है उनमे
निर्भयता आजाती है !और अगर किसी में निर्भयता आती है तो वो किसी से भयभीत नहीं होता यह इसका गुण है !
तो इसको समझो उसमे सत्य विराजमन है !
द्वितीय - 'अहिंसा ! जिसने अहिंसा को धारण किया है उसमे प्रेम पैदा हो जाता है ! उसका कोई दुसमन नहीं होता !
तृतीय - 'अस्तेय' अस्तेय कहते है , चोरी ना करने को ! जब कोई किसी की चोरी नहीं करेगा तो दुःख: नहीं होगा !
दुःख: कब होता है ? जब हम दुसरो की चोरी करते है !जिसकी चोरी हमने की हा उसको दुःख: होगा , और वाही
दुःख: हमारी आत्मा को आकर होता है ! इसलिए हम किसी की चोरी नहीं करंगे तो दुःख: भी नहीं होगा ! तो यह
गुण कुछ ऐसेर है ,जिन्हें देख कर आत्मा किसी को वरन करती है !
आत्मा -ज्ञान के लिए चतुर्थ गुण बताया गया है - 'ब्रहमचर्य' ! ब्रहमचारी का अर्थ है - नियमित जीवन व्यतीत करना,
इश्वर में विचरण करना ! ब्रहमचर्य अर्थात - ब्रहम में जिसका चरण चल रहा हो , इश्वर का ध्यान करता हो ,इश्वर में
रहता हो, उसका चलना, रहना ,सहना, इश्वर माया हो! ऐसे मनुष्य को कहते है ब्रह्मचारी नह मनुष्य इश्वर के सामान
होता है ! उसमे सारी शक्तिया आ जाती है ! उसका जीवन पवित्र हो जाता है !
...................................................... आवश्यकता क्यों और किसको ?......................................
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प्राय: लोग कहते है या ऐसा समझते है की आत्म ज्ञान की आवश्यकता केवल साधू, सन्यासी , तपस्वी, ब्रहमचारी या
वृद्ध जनो को होती है ! सत्य तो यह है आत्म-ज्ञान ग्रहस्थ के लिए उतना ही आवश्यक है जितना विरक्तो ओर साधुवों
को है ! आत्मि -ज्ञानी पुरुष कहते है मनुष्य को इसकी इतनी आवश्यकता है जितनी शारीर के लिए नेत्रों की !
* ग्र्हस्थ्यों के लिए आत्म -ज्ञान की आवश्यकता कई लोग नहीं बताते किन्तु प्रत्येक मनुष्य के लिए आवश्यक है !
बिना ज्ञान के जीवन निर्वाह हो ही नहीं सकता मनुष्य मात्र के लिए उतना ही आवश्यक है जितना भोजन, जल, वायु,
आकाश और पृथ्वी !
 

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